छ.ग.का प्रमुख लोक पर्व छेर-छेरा: जानिए पौराणिक मान्यता और सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व
छत्तीसगढ़ की धरती लोकसंस्कृति, जनजातीय परंपराओं और सामूहिक जीवन-मूल्यों के लिए पूरे भारत में विशिष्ट पहचान रखती है। इसी लोकसंस्कृति की आत्मा में रचा-बसा एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है |
छेर-छेरा पर्व
छेर-छेरा पर्व। यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, आपसी सहयोग, दानशीलता, मानवीय करुणा और कृषि-आधारित जीवन-दर्शन का जीवंत उदाहरण है। छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में छेर-छेरा पर्व का विशेष स्थान है। छेर-छेरा पर्व मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ राज्य के ग्रामीण अंचलों, विशेषकर आदिवासी और कृषक समाज में प्रचलित है। इसके अतिरिक्त, ओडिशा, मध्यप्रदेश और झारखंड के कुछ सीमावर्ती क्षेत्रों में भी यह पर्व अलग-अलग नामों और रूपों में मनाया जाता है।
इस पर्व के माध्यम से समाज यह संदेश देता है कि व्यक्तिगत समृद्धि तभी सार्थक है, जब समाज का अंतिम व्यक्ति भी उसमें सहभागी हो। छेर-छेरा पर्व बच्चों के माध्यम से दान, सहयोग और सामूहिकता जैसे मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम है।
यह विस्तृत लेख छेर-छेरा पर्व के इतिहास, उत्पत्ति, लोककथाओं, सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व, धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं, क्षेत्रीय विविधताओं, लोकगीतों, आधुनिक संदर्भ और भविष्य की संभावनाओं में गहन चर्चा प्रस्तुत करता है।
छेर-छेरा पर्व दीपावली के बाद मनाया जाता है और इसका मूल उद्देश्य समाज में समानता, भाईचारा, दानशीलता और सामूहिकता की भावना को मजबूत करना है। इस पर्व में बच्चे, युवा और कभी-कभी बुजुर्ग भी टोली बनाकर घर-घर जाते हैं, पारंपरिक गीत गाते हैं और अन्न या दान एकत्र करते हैं। यह एकत्रित सामग्री बाद में सामूहिक भोज या सामाजिक कार्यों में उपयोग की जाती है।
छेर-छेरा शब्द की उत्पत्ति और मतलब -
'छेर-छेरा' शब्द छत्तीसगढ़ी लोकभाषा से उत्पन्न माना जाता है। भाषाविदों और लोकसंस्कृति के अध्येताओं के अनुसार:
छेर का अर्थ है – माँगना, एकत्र करना या संग्रह करना।
छेरा का आशय है – बाँटना या सामूहिक उपयोग के लिए देना।
'छेर-छेरा' शब्द छत्तीसगढ़ी और आस-पास की लोकबोलियों से निकला हुआ माना जाता है।
इस प्रकार छेर-छेरा का शाब्दिक अर्थ हुआ – सामूहिक भलाई के लिए संग्रह और वितरण। यह पर्व इसी भावना पर आधारित है। इसमें माँगने वाला और देने वाला दोनों सम्मान के पात्र होते हैं, क्योंकि यह क्रिया व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए की जाती है।
कुछ लोकविद यह भी मानते हैं कि 'छेर-छेरा' शब्द की उत्पत्ति प्राचीन जनजातीय अनुष्ठानों से हुई है, जहाँ फसल कटाई के बाद देवताओं और समुदाय के लिए अन्न संग्रह की परंपरा थी।
सामाजिक अर्थ
छेर-छेरा में माँगने की क्रिया भी सम्मानजनक मानी जाती है, क्योंकि यह व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं होती। वहीं देने वाला भी स्वयं को पुण्य और सामाजिक दायित्व से जुड़ा हुआ महसूस करता है। इस तरह यह पर्व समाज में आत्मसम्मान और परस्पर सम्मान दोनों को बनाए रखता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
प्राचीन कृषि सभ्यता से संबंध
छेर-छेरा पर्व का इतिहास छत्तीसगढ़ के प्राचीन कृषि समाज से गहराई से जुड़ा हुआ है। छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है। यहाँ की अर्थव्यवस्था सदियों से धान की खेती पर आधारित रही है। जब वर्षा ऋतु समाप्त होती थी और धान की फसल कटाई के लिए तैयार होती थी, तब समाज में अन्न की उपलब्धता बढ़ जाती थी। ऐसे समय में समाज के सभी वर्गों को इस समृद्धि में सहभागी बनाने के लिए सामूहिक उत्सव मनाए जाते थे। छेर-छेरा पर्व इसी परंपरा का विकसित रूप माना जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि गाँव का कोई भी परिवार भूखा न रहे और सभी के घर में अन्न पहुँचे।
जनजातीय सामूहिकता की परंपरा
छत्तीसगढ़ में गोंड, मुरिया, बैगा, उरांव, हल्बा, कंवर जैसी अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं। इन जनजातियों की सामाजिक संरचना सामूहिक जीवन पर आधारित रही है। जंगल, जमीन और संसाधन सामूहिक माने जाते थे।
छेर-छेरा पर्व में दिखाई देने वाली दान, संग्रह और सामूहिक भोज की परंपरा इन्हीं जनजातीय मूल्यों की देन है। यह पर्व लिखित इतिहास से बहुत पहले से लोकजीवन में प्रचलित रहा है।
लोककथाएँ और पौराणिक मान्यताएँ
अकाल से जुड़ी लोककथा
छेर-छेरा पर्व से जुड़ी एक अत्यंत लोकप्रिय लोककथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक गाँव में भयंकर अकाल पड़ा। फसल नष्ट हो गई, लोग भूख से पीड़ित होने लगे। तब गाँव के बच्चों ने मिलकर घर-घर जाकर अन्न एकत्र किया और जरूरतमंदों में बाँट दिया। इस सामूहिक प्रयास से गाँव ने अकाल का सामना किया। उसी घटना की स्मृति में हर वर्ष छेर-छेरा पर्व मनाया जाने लगा।
देवी-देवताओं से संबंध
कुछ क्षेत्रों में यह मान्यता भी है कि दीपावली के बाद देवी लक्ष्मी और ग्राम देवता गाँव का भ्रमण करते हैं। जो लोग छेर-छेरा के अवसर पर दान देते हैं, उनके घरों में वर्ष भर धन-धान्य की कमी नहीं होती। इस कारण इसे धार्मिक पुण्य का कार्य भी माना जाता है।
छेर-छेरा पर्व की प्रमुख परंपराएँ
1.बच्चों और युवाओं की टोली
छेर-छेरा पर्व का सबसे आकर्षक पक्ष बच्चों की टोली होती है। बच्चे पारंपरिक वेशभूषा में, हाथ में टोकरी या थैला लेकर गाँव की गलियों में घूमते हैं। वे घर-घर जाकर 'छेर-छेरा' की पुकार लगाते हैं।
2. लोकगीत और नारे
इस अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीत छत्तीसगढ़ी भाषा में होते हैं। इनमें हास्य, व्यंग्य, आशीर्वाद और सामाजिक संदेश समाहित रहते हैं। कई गीतों में गृहस्वामी की प्रशंसा की जाती है, जिससे वह प्रसन्न होकर दान देता है।
"छेर-छेरा माई, अन्न देबे त भाई"
3. अन्न और दान का संग्रह
गृहस्वामी अपनी क्षमता के अनुसार चावल, धान, दाल, सब्ज़ी, गुड़ या पैसे देते हैं। इसे शुभ माना जाता है और ऐसा विश्वास है कि इससे घर में बरकत आती है।
4. सामूहिक भोज और वितरण
एकत्रित अन्न से सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है या जरूरतमंद परिवारों में बाँटा जाता है। यह सामाजिक समानता और सहयोग का प्रतीक है।
सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
छेर-छेरा पर्व समाज में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाता है:
सामाजिक एकता और भाईचारे को बढ़ावा देता है।
अमीर और गरीब के बीच की दूरी को कम करता है।
बच्चों में दान, सहयोग और सामूहिकता के संस्कार विकसित करता है।
लोकगीत, लोकभाषा और परंपराओं को जीवित रखता है।
क्षेत्रीय विविधताएँ
छेर-छेरा पर्व अलग-अलग क्षेत्रों में थोड़े भिन्न रूपों में मनाया जाता है। कहीं इसे केवल बच्चों का पर्व माना जाता है, तो कहीं युवा और बुजुर्ग भी सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। कुछ स्थानों पर यह एक दिन मनाया जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में दो-तीन दिन तक चलता है।
आधुनिक संदर्भ में छेर-छेरा पर्व
समय के साथ छेर-छेरा पर्व के स्वरूप में कुछ परिवर्तन आए हैं। शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण इसका प्रभाव कुछ क्षेत्रों में कम हुआ है। फिर भी, छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में यह पर्व आज भी पूरी आस्था और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
आज कई स्थानों पर एकत्रित धन का उपयोग सामाजिक कार्यों, विद्यालयों, मंदिरों या सामुदायिक भवनों के निर्माण में किया जाता है। इससे यह पर्व आधुनिक समाज में भी प्रासंगिक बना हुआ है।
छेर-छेरा पर्व छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति की आत्मा है। यह पर्व हमें सिखाता है कि समाज की सच्ची समृद्धि सामूहिक सहयोग और आपसी प्रेम में निहित है। इतिहास, लोककथाओं और परंपराओं से समृद्ध यह पर्व आज भी हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखता है।
यह पर्व मानवता, समानता, सहयोग और करुणा का संदेश देता है। लगभग हजारों वर्षों से यह पर्व लोकजीवन को दिशा देता आ रहा है।
आज के भौतिकवादी युग में भी छेर-छेरा पर्व हमें यह याद दिलाता है कि समाज तभी समृद्ध होगा, जब उसका हर व्यक्ति समृद्ध होगा। इस अमूल्य लोकपर्व को सहेजना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।

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